शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

बोधपाठ

इंगलैण्ड की राजधानी लंदन में यात्रा के दौरान
एक शाम महाराजा जयसिंह सादे कपड़ों में
बॉन्ड
स्ट्रीट में घूमने के लिए निकले और
वहां उन्होने
रोल्स रॉयस कम्पनी का भव्य शो रूम
देखा और
मोटर कार का भाव जानने के लिए अंदर
चले गए।
शॉ रूम के अंग्रेज मैनेजर ने उन्हें “कंगाल
भारत”
का सामान्य नागरिक समझ कर वापस भेज
दिया। शोरूम के सेल्समैन ने भी उन्हें बहुत
अपमानित किया, बस उन्हें “गेट आऊट”
कहने के
अलावा अपमान करने में कोई कोर कसर
नहीं छोड़ी।अपमानित महाराजा जयसिंह
वापस
होटल पर आए और रोल्स रॉयस के
उसी शोरूम पर
फोन लगवाया और
संदेशा कहलवाया कि अलवर
के महाराजा कुछ मोटर कार खरीदने
चाहते हैं।
कुछ देर बाद जब
महाराजा रजवाड़ी पोशाक में
और अपने पूरे दबदबे के साथ शोरूम पर पहुंचे
तब तक
शोरूम में उनके स्वागत में “रेड कार्पेट”
बिछ
चुका था। वही अंग्रेज मैनेजर और सेल्समेन्स
उनके
सामने नतमस्तक खड़े थे। महाराजा ने उस
समय
शोरूम में पड़ी सभी छ:
कारों को खरीदकर,
कारों की कीमत के साथ उन्हें भारत
पहुँचाने के
खर्च का भुगतान कर दिया।
भारत पहुँच कर महाराजा जयसिंह ने
सभी छ:
कारों को अलवर नगरपालिका को दे
दी और
आदेश दिया कि हर कार का उपयोग (उस
समय के
दौरान 8320 वर्ग कि.मी) अलवर राज्य
में
कचरा उठाने के लिए किया जाए।
विश्व की अव्वल नंबर मानी जाने
वाली सुपर
क्लास रोल्स रॉयस कार नगरपालिका के
लिए
कचरागाड़ी के रूप में उपयोग लिए जाने के
समाचार पूरी दुनिया में फैल गया और
रोल्स
रॉयस की इज्जत तार-तार हुई। युरोप-
अमरीका में
कोई अमीर व्यक्ति अगर ये कहता “मेरे
पास रोल्स
रॉयस कार” है तो सामने
वाला पूछता “कौनसी?” वही जो भारत में
कचरा उठाने के काम आती है! वही?
बदनामी के कारण और
कारों की बिक्री में
एकदम कमी आने से रोल्स रॉयस कम्पनी के
मालिकों को बहुत नुकसान होने लगा।
महाराज
जयसिंह को उन्होने क्षमा मांगते हुए
टेलिग्राम
भेजे और अनुरोध किया कि रोल्स रॉयस
कारों से
कचरा उठवाना बन्द करवावें। माफी पत्र
लिखने
के साथ ही छ: और मोटर कार बिना मूल्य
देने के
लिए भी तैयार हो गए।
महाराजा जयसिंह जी को जब
पक्का विश्वास
हो गया कि अंग्रेजों को वाजिब बोधपाठ
मिल
गया है तो महाराजा ने उन कारों से
कचरा उठवाना बन्द करवाया !
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भारतीय को अपनी ताकत के bare में
बताईये !!! JAI HO !!

बुधवार, 16 जनवरी 2013

व्यापार का साधन

उन दिनों महावीरप्रसाद द्विवेदी सरस्वती नामक पत्रिका का संपादन करते थे । अपने लेखन के कारण वह काफी विख्यात हो चुके थे । एक बार एक सज्जन ने उन्हें स्वदेशी शक्कर की कुछ थैलियां भेंट की । उन महाशय का शक्कर की थैलियां देने के पीछे विचार यह था कि महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती में उनकी प्रशंसा में कुछ ऐसा लिख दें कि वह शहर भर में चर्चित हो जाएं ।
                                                                थैलियां देने के कुछ दिन बाद वह सज्जन फिर महावीर प्रसाद द्विवेदी से मिले और उन्हें अपनी थैलियों के विषय में याद दिलाया तो महावीर प्रसाद द्विवेदी मुस्कराते हुए उठे और अलमारी से उनकी थैलियां निकाल कर देते हुए बोले,'' भाई, तुम्हारी थैलियां जैसी की तैसी रखी हुई हैं। सरस्वती को व्यापार का साधन बना कर मैं उसे लक्ष्मी के समक्ष अपमानित नहीं कर सकता।''

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

ज्ञान का सागर

 राम तीर्थ एक बार ऋषिकेष में गंगा किनारे घूमने के इरादे से गए। वहां एक साधु को आराम से बैठा देख कर अचानक उनके मन में कोई विचार आया और पूछा, बाबा, ‌''आप के संन्यास को कितना समय हो गया ।''      ''हो गए होंगे 40 साल '' साधु ने उत्तर दिया।
  '' आप ने इन 40 वर्षों में आपने क्या प्राप्त किया ? " स्वामी रामतीर्थ ने पूछा।
  '' इसे देखते हो '', गंगा की और इशारा करते हुए साधु ने बड़े गर्व से कहा,'' मैं अगर चाहूं तो पानी पर चलकर दूसरे छोर पर जा सकता हूं। "
'' उस छोर से इस छोर पर वापिस भी आ सकते होगें ?
'' बिल्कुल वापिस आ सकता हूं,''  साधु की गर्दन गर्व से कुछ और तन गयी। '' इस के इलावा  और कुछ ? राम तीर्थ ने नया प्रश्न उछाल दिया।
'' क्या तुम इसे आम काम समझते हो ? ''  साधु ने तीखे स्वर में पूछा।
  राम तीर्थ साधु की बात पर मुस्करा दिए।
''बाबा माफ करना। मै तो यही कहंूगा की आप ने 40 साल यों ही खों दिये। नदी में नौका भी चलती हैं। दो आने उधर जाने के और दो आने इधर आने के लगते है।40 साल में आप ने केवल वहीं पाया जो कोर्इ भी व्यकित चार आने खर्च कर के पा सकता हैं। आप ने ज्ञान के सागर में छलांग लगार्इ जरूर, पर मोती की जगह पत्थर उठा लाए।      -  

बुधवार, 14 नवंबर 2012

सहनशक्ति

सरदार वल्लभ भाई पटेल फौजदारी के प्रसिद्ध वकील थे । एक बार वह फौजदारी के एक मामले में अदालत में पैरवी कर रहे थे । मामला संगीन था और उनकी जरा-सी असावधानी अभियुक्त को फांसी दिला सकती थी । वह गंभीरतापूर्वक अपने तर्क दे रहे थे । तभी किसी ने उनके नाम का एक तार लाकर उन्हें थमा दिया । उन्होंने तार खोला, पढ़ा और मोड़ कर जेब में रख लिया । फिर उन्होंने उसी तन्मयता से बहस शुरू कर दी ।
                                        अदालत का समय समाप्त हुआ तो वह लपक कर बाहर की तरफ चल दिए । तभी साथी वकील ने तेजी से पास आकर उनसे तार के बारे में पूछा तो वह बोले, ''मेरी पत्नी की मृत्यु हो गई है । उसी की सूचना थी ।'' साथी ने कहा, ''इतनी बड़ी घटना घट गई और तुम बहस करते रहे ।'' वल्लभ भाई का उत्तर था, ''और क्या करता ?'' वह तो चली गई क्या अभियुक्त को भी चला जाने देता ?'' ऎसे थे लौह-पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल।

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

गृहमंत्री

   लालबहादुर शास्त्री जी के जन्म दिवस पर आपको हार्दिक बधाई

लालबहादुर शास्त्री (2 अक्तूबर, 1904 - 11 जनवरी, 1966), भारत के तीसरे और दूसरे स्थायी प्रधानमंत्री थे । वह 1963-1965 के बीच भारत के प्रधान मन्त्री थे। उनका जन्म मुगलसराय, उत्तर प्रदेश मे हुआ था।
                                                            उन दिनों लालबहादुर शास्त्री जी उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री थे । उन्हीं दिनों एक मित्र ने उनसे कहा, ''सिर्फ आधे इंच ऊंचाई कम होने के कारण मेरे पुत्र को थानेदार का पद नहीं मिला । इस मामले में यदि आप थोड़ी-सी सिफारिश कर दें तो संभव है काम बन जाए ।''
                                     शास्त्री जी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, '' यदि सचमुच आपके पुत्र की ऊंचाई कम है तो उसे यह जगह किसी भी तरह नहीं मिल सकती ।''  मित्र जरा नाराज होकर बोला, ''आप का कद तो जरूरत से ज्यादा ठिगना है, फिर भी आप राज्य के गृह मंत्री हैं और मेरा पुत्र ऊंचाई से सिर्फ आधे इंच की कमी के कारण थानेदार नहीं बन सकता। क्या यह अन्याय नहीं है ?''
                                                                                   यह सुनकर शास्त्री जी मुस्कराए और बोले, ''आप ठीक कहते हैं। मैं ठिगना हूं फिर भी गृहमंत्री बन सकता हूं, लेकिन सच तो यह है कि इच्छा होने पर भी मैं थानेदार नहीं बन सकता । ठीक इसी प्रकार आप का बेटा भी ऊंचाई कम होने के कारण थानेदार तो नहीं बन सकता, लेकिन वह किसी दिन मेरी तरह गृह मंत्री जरूर बन सकता है । मेरी शुभकामनाएं उसके साथ है। '' शास्त्री जी के इस तर्क का मित्र के पास कोई जवाब न था ।