शनिवार, १४ नवम्बर २००९

अपराध

मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर अंग्रेजों की कैद में अपने जीवन के अंतिम दिन बड़े कष्ट से बिता रहे थे । एक बार एक व्यक्ति उनसे मिलने आया। उसने बादशाह से कहा, ''आप को जो कष्ट दिए जा रहे हैं, आप उसकी शिकायत क्यों नहीं करते ?''
उन्होंने दुःख भरे स्वर में जवाब दिया, '' मेरी यही सजा है क्योंकि बादशाह होने के नाते में देश का पहरेदार था । फिर भी मैं आराम की नींद सोता रहा । समय रहते न तो मैं जागा और न ही दुश्मन को ललकारा, इससे बड़ा अपराध और क्या हो सकता है ?''

सोमवार, २ नवम्बर २००९

संस्कार

रामकृष्ण परमहंस अपने लोटे को प्रतिदिन मांजते थे । यह देख कर उनका एक शिष्य मन ही मन सोचता था कि इस तरह लोटा मांजने का अर्थ क्या हैं? आखिरकार जब उस से नहीं रहा गया तो वह उनसे पूछ बैठा । रामकृष्ण परमहंस ने से जवाब में हंस कर कहा,''याद रखो कि हमें अपने अंतर्मन को भी इसी तरह मांजना है । यह लोटा कितना ही साफ क्यों न हो, यदि इसे प्रतिदिन मांजा न जाए तो यह मैला हो जाएगा । इसी तरह बुरे संस्कारों में पड़ कर हमारा मन दूषित न हो जाए इसके लिए भी हमें निरन्तर अच्छे संस्कारों से उसे मांजना चाहिए ताकि बुराई का मैल उसे गंदा न कर सके।''


रविवार, २५ अक्तूबर २००९

कर्त्तव्य

भारतीय इंजीनियरों के पितामह डॉक्टर विश्वेश्वरैया हमेशा निष्पक्ष ढंग से कार्य करते थे । एक बार जब वह मैसूर रियासत के दीवान थे तो किसी गांव में उनका कैंप लगा । एक दिन वहां काम करते वक्त उन की उंगलियों में चोट लग गई । गांव के डॉक्टर ने उचित रूप से मरहमपट्टी की । विश्वेश्वरैया ने 25 रूपए का चैक फीस के रूप में डॉक्टर को दे दिया । चैक को लौटाते हुए डॉक्टर बोला, ''मेरा सौभाग्य है कि आप की सेवा करने का मुझे अवसर मिला। इस पर विश्वेश्वैरया उस डॉक्टर पर बिगड़े और बोले, ''हर मरीज की सेवा करने का मौका आप का सौभाग्य है, आप को ऐसा महसूस करना चाहिए, जो लोग पैसा दे सकते हैं, उनसे लेना चाहिए ताकि जो लोग पैसा नहीं दे सकते उन से लेने की लालसा आप में न रहे। आप ने अपना कर्त्तव्य किया कृपया मुझे अपना कर्त्तव्य करने दें ।''

शनिवार, १७ अक्तूबर २००९

गौरव

दीवाली की शुभकामनाओं के साथ एक प्रस्तुति -
हाकी के दिवंगत जादूगर ध्यानचंद ने एक बार हिटलर के सामने अपनी बेहतरीन खेल कला का प्रदर्शन किया तो उसे खुश हो कर हिटलर ने उनके समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि वह जर्मनी की टीम में शामिल हो जाए तो उन्हें कप्तान बना दिया जाएगा ।
हिटलर ने प्रस्ताव को नकारते हुए ध्यानचंद ने जवाब दिया,'' मैं अपने देश की टीम में एक साधारण खिलाड़ी की हैसियत से खेलना ज्यादा सम्मान जनक मानता हूं । दूसरे देश की टीम का कप्तान बन कर मुझे संतोष और गौरव नहीं मिल सकता ।'' यह सुन कर हिटलर अवाक रह गया ।

शुक्रवार, २ अक्तूबर २००९

नींव का पत्थर

( अक्टूबर) शास्त्री जी के जन्म-दिन पर विशेष प्रस्तुति
लालबहादुर शास्त्री बड़े ही हंसमुख स्वभाव के थे, लोग उन के भाषण, निःस्वार्थ सेवा भावना जैसे गुणों से अनायास ही प्रभावित हो जाते थे, लेकिन जब वह लोक सेवा मंडल के सदस्य बने तो बहुत ज्यादा संकोची हो गए | वह नहीं चाहते थे कि उन का नाम अखबारों में छपे और लोग उन की प्रशंसा और स्वागत करें एक दिन शास्त्री जी के कुछ मित्रों ने उन से पूछा, ''शास्त्री जी , आप को अखबारों में नाम छपवाने से इतना परहेज क्यों हैं ?'' शास्त्री जी कुछ देर सोच कर बोले, '' लाला लाजपत राय जी ने लोक सेवा मंडल के कार्य की दीक्षा देते हुए कहा था, '' लालबहादुर, ताजमहल में दो प्रकार के पत्थर लगे हैं, एक बढ़िया संगमरमर के पत्थर हैं, जिन को सारी दुनिया देखती है तथा प्रशंसा करती है, दूसरे वे पत्थर हैं जो ताजमहल की नींव में लगे हैं, जिनके जीवन में केवल अंधेरा ही अंधेरा है, लेकिन ताजमहल को वे ही खड़ा रखे हुए हैं ? लाला जी के ये शब्द मुझे हर समय याद रहते हैं, मैं नींव का पत्थर ही बना रहना चाहता हूँ |

सोमवार, २८ सितम्बर २००९

निश्चय

यह घटना इंडोनेशिया की है । एक स्कूल का छात्र एक दिन अचानक हठ कर बैठा कि आज से मैं स्कूल नहीं जाऊंगा । पिता ने बड़े प्यार से कारण पूछा तो उस ने कहा, ''इस नए स्कूल में लड़के मेरा मजाक उड़ाते हैं।'' पिता ने कहा, ''इस में कौन सी नई बात है, कुछ समय बाद वे तुम से घुलमिल जाएंगे और तुम्हारे मित्र बन जाएंगे।'' ''कुछ भी हो, मैं स्कूल नहीं जाऊंगा, कह कर लड़के ने किताबें पटक दी ।'' मां-बाप ने लाख समझाया, लेकिन लड़का अपनी जिद पर अड़ा रहा। पिता ने अपने एक मित्र को यह समस्या बताई तो वह मित्र उस लड़के को एक पानी के झरने के पास ले गए । उन्होंने एक बड़ा सा पत्थर पानी के बीच में फेंक दिया और कहा कि ह पत्थर पानी के बहाव में रूकावट डाल देगा | कुछ क्षणों के लिए पानी का वेग रूक गया, लेकिन फिर थोड़ी ही देर में वह अपनी गति से बहने लगा । वह पत्थर पानी में डूब गया ।
इस पर वह लड़के से बोला, ''बेटा, किसी भी प्रकार की रूकावट या बाधओं से नहीं घबराना चाहिए । देखो, पानी भी रूकावट पर विजय पा कर पहले की तरह बह रहा है। फिर तुम मनुष्य होकर बाधाओं से क्यों घबराते हो ?'' लड़के ने अगले दिन से स्कूल जाना प्रारम्भ कर दिया । कुछ दिनों में उसके सहपाठी उसके मित्र बन गए और बाद में स्वतंत्रता संग्राम में उसके अनुयायी बने । यह लड़का और कोई नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के भूतपूर्व राष्ट्रपति सुकर्णो थे । इंडोनेशिया को आजाद कराने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा ।


रविवार, २० सितम्बर २००९

रक्षक

एक बार स्वामी रामतीर्थ जापान गए । वहां उनका खूब सत्कार हुआ । उन्हें एक स्कूल में निमंत्रित किया गया । स्कूल का दौरा करने के दौरान जाने क्या सोच कर स्वामी रामतीर्थ ने नन्हें विद्यार्थी से पूछा, ''तुम किस धर्म को मानते हो ? ''बौद्ध धर्म को |'' विद्यार्थी ने उत्तर दिया । स्वामी जी ने फिर प्रश्न किया, ''हात्मा बुद्ध के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं ?'' विद्यार्थी ने झट उत्तर दिया, ''बुद्ध तो भगवान हैं ।'' यह कहकर उसने मन ही मन बुद्ध का ध्यान कर अपने देश की प्रथा के अनुसार बुद्ध को प्रणाम किया ।
तब स्वामी जी ने उस विद्यार्थी से पूछा, ''तुकन्फ्युशियस के बारे में क्या कहोगे?'' विद्यार्थी ने श्रद्धा भाव से कहा, '' कन्फ्युशियस एक महान् संत थे।'' उसने बुद्ध की तरह कन्फ्युशियस का ध्यान कर उसे भी प्रणाम किया। स्वामी मुस्करा कर बोले, ''अच्छा, अब मेरे एक और प्रश्न का जवाब दो,'' मान लो, अगर कोई देश तुम्हारे जापान पर आक्रमण करता है, और उसके मुख्य सेनाधिति बुद्ध या कन्फ्युशियस हों तो तुम क्या करोगे ?''
स्वामी रामतीर्थ का यह कहना था कि विद्यार्थी का चेहरा क्रोध और जोश के मिले-जुले भाव से तमतमा उठा । वह कड़क कर बोला, ''मैं अपनी तलवार से बुद्ध का सिर काट लूंगा और कन्फ्युशियस को पैरों तले कुचल दूंगा ।'' स्वामी रामतीर्थ यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए । उस बालक का उठा कर उसका मुख मंडल चूमते हुए बोले, ''जिस देश के रक्षक तुम जैसे हों, उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता ।''