मंगलवार, 13 मार्च 2012

मित्र

अमरीका में गृह युद्ध चल रहा था । उस समय अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति थे । एक बार वह घायलों के खेमें में गए । वहां से घूमते-घूमते वह दुश्मन सैनिकों के खेमें में भी चले गए और उन से प्यार से बातें करने लगे। जब वह बाहर निकले तो एक बुढि़या ने उनसे पूछा, ''तुम अपने दुश्मनों से इतने प्यार से क्यों बोलते हो, जब कि तुम्हें तो उन्हें खत्म कर देना चाहिए।'' अब्राहम लिंकन ने मुस्करा कर उत्तर दिया, ''क्या मैं अपने दुश्मनों का खत्म नहीं कर देता, जब मैं उनसे दोस्ती कर के उन्हें अपना मित्र बना लेता हूं।''

बुधवार, 30 नवंबर 2011

प्रगति में बाधक

एक बार संत विनोबा भावे को गांधी जी ने पत्र लिखा । पत्र पढ़कर विनोबा जी ने उसे फाड़ दिया । यह देखकर आश्रम के छात्रों को बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि सभी जानते थे कि विनोबा सदा ही गांधी जी के पत्र संभाल कर रखते थे। एक छात्र से न रहा गया उसने विनोबा जी से पूछ ही लिया,''आप ने पत्र क्यों फाड़ दिया?'' विनोबा जी ने बताया,''इस पत्र में कुछ गलत बातें लिखी थीं ।'' यह सुनकर छात्रों का कुतूहल बढ़ गया । एक ने पूछा,लेकिन गुरुदेव, ''आप तो कहते हैं कि गांधी जी कभी झूठ नहीं बोलते फिर उन्होंने झूठी या गलत बात कैसे लिखी?''''गांधी जी झूठ नहीं बोलते यह सच है, लेकिन इस पत्र में उन्होंने मेरी प्रशंसा की थी और मुझे सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति कहा था । सच तो यह है कि इस संसार में मुझ से भी अधिक गुणी व्यक्ति मौजूद हैं । अतः गांधी जी की यह बात सच नहीं हो सकती थी, शायद किसी दृष्टि से यह सच भी हो तो भी यह पत्र मुझ में अंहकार ही पैदा करता, जो मेरी प्रगति में बांधक होता। बस, इसलिए मैंने पत्र को फाड़ डाला।''

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

सच्चा उपदेश

एक दिन महात्मा बुद्ध का एक शिष्य उनके पास पहुंचा और बोला,''आज मैंने एक भिखारी को बुला कर बहुत देर तक उसे धर्म की शिक्षा दी, प्रेरक उपदेश दिए, परन्तु उस मूर्ख ने मेरी बातों पर कोई गौर नहीं किया ।''
शिष्य की बात सुन कर बुद्ध ने उसे भिखारी को बुला लाने को कहा । जब भिखारी दीनहीन अवस्था में आया तो बुद्ध ने उसे भर पेट खाना खिला कर प्रेमपूर्वक विदा कर दिया । इस पर उनके शिष्य ने आश्चर्य से पूछा,''आप ने उसे बिना कोई उपदेश दिए भेज दिया?'' इस पर बुद्ध बोले,''आज उसके लिए भोजन ही उपदेश था । उसे प्रवचन से ज्यादा अन्न की जरूरत थी । यही सच्चा उपदेश है ।'' यह सुन कर उनका शिष्य निरुत्तर हो गया ।

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

प्रजा की धरोहर

दिल्ली के सिंहासन पर उन दिनों गुलाम वंशीय बादशाह नसीरूद्दीन का शासन था । वह बड़ा नीतिनिष्ठ एवं पुरुषार्थी शासक था । पुस्तक लिखने से उसको जो आय होती, उसी से वह अपना जीवन निर्वाह करता था । राजकोष से उसने कभी एक पैसा भी अपने या अपने परिवार के निजी खर्च के लिए नहीं लिया था । मुसलमान शासकों के रिवाज के विपरीत उसके एक ही पत्नी थी । नौकर कोई भी नहीं था । यहां तक कि रसोई भी स्वयं बेगम को अपने हाथ से बनानी पड़ती थी ।
एक बार रसोई बनाते समय उनकी बेगम साहिबा का हाथ जल गया । बेगम ने बादशाह से कुछ दिन के लिए नौकरानी रखने की प्रार्थना की तो बादशाह ने उत्तर दिया,''प्रजाकोष पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। वह तो मेरे पास प्रजा की धरोहर मात्र है। उस में से मैं अपने खर्च के लिए एक पैसा भी नहीं ले सकता और मेरी स्वयं की कमाई इतनी है नहीं कि उसमें से नौकर रखा जाए। तुम ही बताओं हम नौकर कहां से रखें।'' अपने पति की बात सुनकर उनकी बेगम अत्यंत प्रभावित हुई।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

व्यक्तिगत धारणा

नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने एक विरोधी को उच्च पद पर नियुक्त किया तो कुछ अधिकारियों ने कहा, ''सम्राट, इस व्यक्ति के विचार आप के बारे में अच्छे नहीं हैं ।'' नेपोलियन ने हंसते हुए कहा, ''जिस पद के लिए मैंने उस व्यक्ति को नियुक्त किया है, उसके लिए वह पूर्णतया योग्य है ।'' मेरे बारे में उसकी व्यक्तिगत धारणा क्या है, इसकी मुझे परवाह नहीं, क्योंकि कोई किसी का कुछ भी बिगाड़ अथवा संवार नहीं सकता।''