शनिवार, 15 अगस्त 2009

आजादी का सिपाही

आजादी से कुछ साल पहले की बात है । पूरे देश में आन्दोलन की लहर थी । उसी लहर में उड़ीसा के ढेंकानाल जिले में अनगुल गांव की जनता वहां के राजा के खिलाफ एकजुट होने लगी । वहां प्रजा परिषद् के गठन की मांग होने लगी वहां का राजा अंग्रेजों की कठपुतली था आन्दोलन से घबरा कर उसने अंग्रेजों से सहायता मांगी, अंग्रेजों ने सहायता देने के बदले यह शर्त रखी कि आन्दोलन दबाने के बाद उस राज्य का संचालन उन्हें सौंपना होगा । राजा ने शर्त मान ली उसी दिन अंग्रे फौजी अनगुल जाने के लिए नदी के दूसरे पार धमके। नदी के किनारे एक 12 वर्षीय लड़के से फौज की एक टुकड़ी के कप्तान ने कड़क कर कहा, '' लड़के, ना लगा, हमें पार जाना है|'' कप्तान ने सोचा कि दूसरे लड़कों की तरह वह भी कांप कर हुक्म पूरा करेगा, लेकिन वह लड़का तन कर खड़ा रहा और उसकी आज्ञा नहीं मानी कप्तान चौंक गया, फिर गुस्से से कांपते हुए बोला, ''चल, नाव लगा ।'' ''हीं, मैं नहीं गाऊंगा|'' उस लड़के ने कड़क कर कहा ''हुत हो चुका| चलो! नाव पर चढ़ो|'' गोरे कप्तान ने झुंझला कर बाकी अंग्रेजों को आदेश दिया । ''हीं, खबरदार! जो कोई नाव पर चढ़ा|'' लड़का पतवार लेकर बीच में अड़ गया एक अंग्रेज सिपाही इसे बचपन की चंचलता समझ कर आगे बढ़ा तभी पतवार का चैड़ा सिरा उस के सिर से टकराया और अगले ही क्षण वह खून से लथपथ सिर को थामे पानी में गोते लगा रहा था यह दृश्य देख कर क्रोध् से अंग्रेज कप्तान हिंसक हो उठा और अगले ही क्षण उस की पिस्तौल गरजी, धांय-धां ? और इस तरह अनगुल का वह साहसी किशोर बाजीराव अपने गांव की स्वतंत्रता को कायम रखने के प्रयास में शहीद हो गया ।

1 टिप्पणी:

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र ने कहा…

badhiya post
स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामना