बुधवार, 5 जनवरी 2011

सच्ची शिक्षा

उन दिनों अमरीका में दास प्रथा का चलन था । एक धनी व्यक्ति ने बेंकर नाम के मेहनती गुलाम को खरीदा । वह बेंकर के गुणों से संतुष्ट था । एक दिन बेंकर अपने मालिक के साथ उस जगह गया, जहां लोग जानवरों की तरह बिकते थे तभी बेंकर ने एक बूढ़े दास को खरीदने के लिए कहा । उस के आग्रह करने पर मालिक ने उसे खरीद लिया और घर ले गया ।
बेंकर प्रसन्न था । वह उस बूढ़े दास की खूब सेवाटहल करता था । मालिक द्वारा एक दिन इस विषय में पूछने पर बेंकर ने बताया कि यह दास उसका कोई संबंध नहीं है, न ही मित्र है, बल्कि उसका सब से बड़ा दुश्मन है। बचपन में इसी ने मुझे दास के रूप में बेच दिया था । बाद में खुद पकड़ा गया और दास बना लिया गया । मैंने उस दिन बाजार में इसे पहचान लिया था । मेरी मां ने मुझे बताया था कि अगर दुश्मन नंगा हो तो उस को कपड़े दो, भूखा हो तो खाना खिलाओ, प्यासा हो तो पानी पिलाओ, इसी कारण मैं इसकी सेवा करता हूं और अपनी मां को दी हुई शिक्षा पर चलता हूं । यह सुन कर मालिक ने बेंकर को गले लगा लिया और उसको आजाद कर दिया ।

8 टिप्‍पणियां:

मो सम कौन ? ने कहा…

मालिक में मानवता बची होगी कुछ।

anshumala ने कहा…

कहानी अच्छी है ,किन्तु क्या आज ऐसे लोग मिलना संभव है |

deepak saini ने कहा…

बहुत अच्छी शिक्षा प्रद कहानी

Archana ने कहा…

वाकई प्रेरणास्पद

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

प्रेरणादायी.....

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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दिनेश जी आप प्रेरक नीति कथाओं से न केवल तात्कालिक मार्गदर्शन दे रहे हैं बल्कि एक अच्छा संग्रह तैयार कर रहे हैं.
आपके इस प्रयास को साधुवाद. ये छोटे-छोटे प्रसंग बड़ी-बड़ी विकट परिस्थितियों में मार्ग/उपाय सुझा देते हैं.
मानवीय मूल्यों की महत्ता को बताते चलते हैं.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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आपके घर का रास्ता संजय जी ने दिखाया. मैं उनका भी आभारी हूँ.

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prkant ने कहा…

मुझे भी संजय जी ने ही पता बताया.
आपका प्रयास सराहनीय है.