सोमवार, 31 जनवरी 2011

विनम्रता

एक बार अमरीका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन अपने दोस्त के साथ घोड़ा गाड़ी से कहीं जा रहे थे । रास्ते में एक मजदूर ने उन्हें थोड़ा झुक कर प्रणाम किया। उसके उत्तर में अब्राहम लिंकन ने उससे भी और ज्यादा झुक कर प्रणाम किया। यह देखकर उनके मित्र ने उनसे पूछा, ''आप ने उस छोटे से मजदूर को इतना झुक कर प्रणाम क्यों किया ?'' अब्राहम लिंकन ने जवाब दिया, ''मैं नहीं चाहता कि विनम्रता में कोई मुझ से आगे निकल जाए ।'' यह सुन कर उनके मित्र का सिर श्रद्धा से झुक गया ।

10 टिप्‍पणियां:

anshumala ने कहा…

यदि विनम्रता में सभी एक दूसरे से आगे निकलना चाहे तो दुनिया का कल्याण हो जाये |

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

मेरे एक एक्स-बॉस कहते थे, ’जितना छोटा आदमी, उतनी बड़ी उसकी ईगो।’ एकदम सही कहते थे वो।
प्रस्तुत घटना सिद्ध करती है कि लिंकन सही में बड़े आदमी थे।

prkant ने कहा…

प्रेरणास्पद कथा.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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अब्राहम लिंकन ने जवाब दिया, ''मैं नहीं चाहता कि विनम्रता में कोई मुझ से आगे निकल जाए ।''
@ लिंकन के इस जवाब से तो लगता है कि वह केवल दिखावे के लिये ही झुकता था. वह शुद्ध राजनीतिज्ञ था! आजकल के नेताओं की तरह.

"... यह सुन कर उनके मित्र का सिर श्रद्धा से झुक गया ।
@ जब मित्र का सिर श्रद्धा से झुक गया तो लिंकन साहब तो उसके चरणों में ही लौट गये होंगे. क्योंकि वे अपने से आगे किसी को निकलता नहीं देख सकते.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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"भूत के दो पाँव उलटे हुआ करते हैं." — सुनी यह बात नानी से.
समझते हैं लोग तबसे
मेरी दृष्टि आदर से सभी को देखती है.
पाँव पर झुक्की हुई 'रेसपेक्टी' है.

करी बार भ्रम में कुछ का कुछ समझ लिया जाता है.
----------- ऎसी ही स्थितियों में जन्म लेता है भ्रम अलंकार.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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पूँजीवादी मानसिकता रास्ते के मजदूर को आगे निकलता देख भी नहीं सकती... चाहे कोई क्षेत्र हो उदारता [भीख/ डोनेशन के सन्दर्भ में] हो अथवा दादागिरी.
जैसे क्लिंटन और बुश मजदूरी प्रधान देशों को आगे निकलता नहीं देख सकते थे और अब ओबामा भी उसी राह पर हैं.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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दिनकर ने कहा था कि "स्वर में पावकता नहीं, तो सभी विनय कृन्दन है." मजदूर की विनम्रता मायने नहीं रखती क्योंकि वह उल्लेखनीय नहीं है. लिंकन की रखती है क्योंकि वह देश का राष्ट्रपति है. उसका छींक में झुक जाना भी विनम्रता माना जाएगा. इतिहास में दर्ज हो जाएगा. यही तो है पूँजीवादी मानसिकता. "जिसपर पूँजी उसपर कुँजी."

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वाणी गीत ने कहा…

विनम्रता अपना असर दिखाती जरुर है , कुछ समय तक लोग उन्हें कमजोर , डरपोक समझते हैं मगर आखिर में वही जीतते हैं !

Deepak Saini ने कहा…

विनम्रता ही से ही आदमी इंसान बनता है

दिनेश शर्मा ने कहा…

इस ब्लाग पर आकर मेरा उत्साह वर्धन करने के लिए मैं आपका आभारी हूं । प्रतुल जी की टिप्पणी से पता चलता है कि वे प्रसंग पर गहनता से विचार करते हैं । शेष प्रतुल जी से तो विनम्रता से यही कहना चाहूंगा कि उनके प्रश्न सा्रगर्भित हैं और उत्तर यही हो सकता है ''जाकी रही भावना जैसी...।''