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रविवार, 24 अक्टूबर 2010

इंसानियत

विवेकानंद किशोरावस्था में व्यायाम के प्रति काफी रूचि रखते थे । वह प्रतिदिन व्यायामशाला जाया करते थे । एक बार वह व्यायामशाला में झूला लगा रहे थे, कि अचानक एक अंग्रेज नाविक ने उनसे और उनके दोस्तों से किसी बात पर झगड़ा शुरू कर दिया । अभी झगड़ा चल ही रहा था कि अचानक व्यायामशाला का एक खंभा अंग्रेज के सिर पर गिर पड़ा, जिससे उसका सिर फट गया और खून बहने लगा ।
खून देख कर अन्य किशोर तो डर गए पर विवेकानंद ने झट झगड़ा भुला दिया और मानसिक संतुलन खोए बिना अपनी कमीज फाड़ी, नाविक के घायल सिर पर पट्टी बांध दी और उसकी बगल में बैठ कर पंखा करने लगे । कुछ देर बाद अंग्रेज नाविक होश में आ गया, बाद में वह अंग्रेज विवेकानन्द का घनिष्ठ मित्र बन गया ।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

निश्चय

वल्लभ भाई पटेल का बचपन गांव में बीता था । वह जिस गांव में रहते थे, वहां कोई अंग्रेजी स्कूल नहीं था । इसलिए  अंग्रेजी पढ़ने वाले विद्यार्थी नित्य 10-11 किलोमीटर पैदल चल कर दूसरे गांव जाते थे । गर्मियों में सुबह 7 बजे स्कूल लगता था । इसलिए सूर्योदय से पहले ही घर से निकल कर खेतों से होते हुए जाना पड़ता था । एक खेत की मेड़ पर लगे पत्थर से अकसर किसी न किसी को ठोकरे लग जाती थी । एक दिन उसी खेती की मेड़ पार करने के बाद छात्रों की एक टोली ने देखा कि उनमें से एक साथी कम है । दरअसल वल्लभ भाई पटेल पीछे छूट गए थे । टोली मुड़ कर लौटी तो देखा कि वल्लभ भाई पटेल की खेत की मेड़ पर किसी चीज से जोर आजमाइश कर रहे हैं । साथियों ने आवाज दी, ''तुम पीछे क्यों रूक गए ?'' ''बस यह पत्थर हटा लूं ।'' वल्लभ भाई पटेल ने वह पत्थर हटाया और साथियों के साथ चलते हुए बोले, ''रास्ते के इस पत्थर से अकसर अड़चन पड़ती थी । अंधेरे में जाने कितनों के पैरों में चोटें आई होंगी । आते जाते चोट लगे और रूकावट पड़े, ऐसी चीज को हटा देने के सिवा कोई चारा नहीं । मैंने निश्चय किया था कि आज इसे हटा कर ही आगे बढूंगा । इसलिए रूक गया था ।''

रविवार, 31 जनवरी 2010

इंसानियत

यह घटना उन दिनों की है, जब लालबहादुर शास्त्री हमारे प्रधानमन्त्री थे । एक दिन वह अपनी पत्नी ललिता शास्त्री के साथ एक साड़ी के कारखाने का दौरा करने गए । उनकी पत्नी को कुछ साड़ियां पंसद आईं । शास्त्री जी ने उन्हें बांधने को कहा और पैसे देने लगे । लेकिन मालिक ने पैसे लेने से इन्कार कर दिया । तब शास्त्री जी ने कहा, ''आज मैं प्रधानमंत्री हूं, इसलिए मुझे इतनी मूल्यवान साड़ियां मुफ्त में दे रहे हो, लेकिन जब मैं प्रधानमंत्री नहीं रहूंगा, तब भी क्या ऐसी साड़ियां आप मुझे मुफ्त दे सकेंगे?'' यह सुन कर मिल मालिक कुछ न बोल सका । उसने चुपचाप पैसे ले लिए ।