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रविवार, 13 फ़रवरी 2011

कर्त्तव्य

साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के गांव दौलतपुर ;जिला रायबरेली में एक मकान की दीवार बहुत कमजोर हो गई थी और किसी भी समय गिर सकती थी । उन्होंने जिलाधिकारी को लिखकर बताया कि उस मकान की दीवार किसी भी समय गिर सकती है, जिससे गुजरने वालों के प्राण भी जा सकते हैं । 
जिलाधिकारी की आज्ञा से एक अधिकारी गांव पहुंचा । स्थिति की जांच कर के उसने पाया कि द्विवेदी जी की आशंका का कोई ठोस आधार नहीं है । उसने कहा, ''द्विवेदी जी, आप की शंका हमारी समझ में नहीं आई । यदि दीवार को गिरना होगा तो गिर जाएगी । उसके गंभीर परिणाम क्या हो सकते हैं ?'' इस पर द्विवेदी जी मुस्कराए और उसे अधिकारी से बोले, ''आप ठीक कहते हैं। बस, इतनी सी बात आप एक कागज पर लिख कर मुझे दे दीजिए कि इस दीवार के गिरने से यदि किसी व्यक्ति की जान चली गई तो उसकी जिम्मेदारी आपकी होगी।'' यह सुनकर अधिकारी निरूत्तर हो गया और उसने तुरंत उस दीवार को गिराने का आदेश दे दिया ।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

कर्त्तव्य-परायणता

बात उन दिनों की है, जब बगदाद में खलीफा उमर थे । वह जितने इन्साफ पसंद, नेक-दिल थे, उतने ही अनुशासन प्रिय और कर्त्तव्य-परायण भी । उन्होंने शराबियों की शराब की लत छुड़ाने के लिए घोषणा की, यदि कोई व्यक्ति शराब पीता हुआ या पीये हुए पकड़ा गया तो उसे भरे दरबार में 25 कोड़े लगाए जाऐंगे । यह सुन कर शराबी घबरा गए। उन्होंने इस ऐलान की सच्चाई जानने के लिए खलीफा के पुत्र को शराब पिला कर बाजार में छोड़ दिया । उसे तुरंत दरबार में पेश किया गया । दरबारियों के समझाने के बावजूद खलीफा ने आज्ञा दी, ''अपराधी की नंगी पीठ पर 25 कोड़े लगाए जाएं ।'' इतने कोड़े खाने पर उनका पुत्र बेहोश होकर गिर पड़ा और उसने वहीं दम तोड़ दिया।