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गुरुवार, 17 जून 2010

स्पष्टवादिता

बालगंगाधर तिलक बचपन से ही सत्यवादी एवं निर्भीक स्वभाव के थे । बचपन में उनकी कक्षा के कुछ विद्यार्थियों ने मूंगफली खाकर छिलके फर्श पर इधर-उधर फैक दिए । अध्यापक ने आ कर देखा कि फर्श पर छात्रों ने कूड़ा फैलाया हुआ है । उन्होंने छात्रों को डांटते हुए कहा, ''यह मूंगफली के छिलके किस-किस ने फेंके हैं ?'' सब लड़के चुप रहे । किसी ने भी अपनी भूल कुबूल नहीं की तो अध्यापक ने गुस्से में लड़कों से हाथ खुलवाए और दो-दो डंडे लगाए ।
जब बाल गंगाधर तिलक की बारी आई तो वह नम्रतापूर्वक स्पष्ट शब्दों में बोले, ''सर, मैंने मूंगफली नहीं खाई । अतः छिलके फेंकने का सवाल ही पैदा नहीं होता । मैं अपराधी नहीं हूं । इसलिए मैं मार नहीं खाउंगा ।'' फिर बताओ, ''मूंगफली किसने खाई है ?'' ''सर, मुझे चुगलखोरी की आदत पंसद नहीं है । इसलिए मैं किसी अन्य छात्रा का नाम भी नहीं लूंगा ।'' लेकिन मार भी नहीं खा सकता ।'' उनकी स्पष्टवादिता ने उन्हें स्कूल से निकलवा दिया । लेकिन उनके इसी गुण ने उन्हें आगे चल कर भारत माता का महान् सपूत बना दिया ।