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बुधवार, 16 जनवरी 2013

व्यापार का साधन

उन दिनों महावीरप्रसाद द्विवेदी सरस्वती नामक पत्रिका का संपादन करते थे । अपने लेखन के कारण वह काफी विख्यात हो चुके थे । एक बार एक सज्जन ने उन्हें स्वदेशी शक्कर की कुछ थैलियां भेंट की । उन महाशय का शक्कर की थैलियां देने के पीछे विचार यह था कि महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती में उनकी प्रशंसा में कुछ ऐसा लिख दें कि वह शहर भर में चर्चित हो जाएं ।
                                                                थैलियां देने के कुछ दिन बाद वह सज्जन फिर महावीर प्रसाद द्विवेदी से मिले और उन्हें अपनी थैलियों के विषय में याद दिलाया तो महावीर प्रसाद द्विवेदी मुस्कराते हुए उठे और अलमारी से उनकी थैलियां निकाल कर देते हुए बोले,'' भाई, तुम्हारी थैलियां जैसी की तैसी रखी हुई हैं। सरस्वती को व्यापार का साधन बना कर मैं उसे लक्ष्मी के समक्ष अपमानित नहीं कर सकता।''

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

गृहमंत्री

   लालबहादुर शास्त्री जी के जन्म दिवस पर आपको हार्दिक बधाई

लालबहादुर शास्त्री (2 अक्तूबर, 1904 - 11 जनवरी, 1966), भारत के तीसरे और दूसरे स्थायी प्रधानमंत्री थे । वह 1963-1965 के बीच भारत के प्रधान मन्त्री थे। उनका जन्म मुगलसराय, उत्तर प्रदेश मे हुआ था।
                                                            उन दिनों लालबहादुर शास्त्री जी उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री थे । उन्हीं दिनों एक मित्र ने उनसे कहा, ''सिर्फ आधे इंच ऊंचाई कम होने के कारण मेरे पुत्र को थानेदार का पद नहीं मिला । इस मामले में यदि आप थोड़ी-सी सिफारिश कर दें तो संभव है काम बन जाए ।''
                                     शास्त्री जी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, '' यदि सचमुच आपके पुत्र की ऊंचाई कम है तो उसे यह जगह किसी भी तरह नहीं मिल सकती ।''  मित्र जरा नाराज होकर बोला, ''आप का कद तो जरूरत से ज्यादा ठिगना है, फिर भी आप राज्य के गृह मंत्री हैं और मेरा पुत्र ऊंचाई से सिर्फ आधे इंच की कमी के कारण थानेदार नहीं बन सकता। क्या यह अन्याय नहीं है ?''
                                                                                   यह सुनकर शास्त्री जी मुस्कराए और बोले, ''आप ठीक कहते हैं। मैं ठिगना हूं फिर भी गृहमंत्री बन सकता हूं, लेकिन सच तो यह है कि इच्छा होने पर भी मैं थानेदार नहीं बन सकता । ठीक इसी प्रकार आप का बेटा भी ऊंचाई कम होने के कारण थानेदार तो नहीं बन सकता, लेकिन वह किसी दिन मेरी तरह गृह मंत्री जरूर बन सकता है । मेरी शुभकामनाएं उसके साथ है। '' शास्त्री जी के इस तर्क का मित्र के पास कोई जवाब न था ।

बुधवार, 15 अगस्त 2012

गौरव की बात

 स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं
बंगाल के एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर आ कर एक रेलगाड़ी खड़ी हुई। साफ सुथरे वस्त्र पहने एक युवक ने ‘कुली कुली’ पुकारना शुरू कर दिया । युवक के पास कोई भारी सामान नहीं था । केवल एक छोटी-सी पेटी थी । भला देहात के छोटे से स्टेशन पर कुली कहां होता ? परंतु तभी एक अधेड़ व्यक्ति साधरण ग्रामीण जैसे वस्त्र पहने युवक के पास आ गया । युवक ने उसे कुली समझ कर कहा, "तुम लोग बड़े सुस्त होते हो चलो, ले चलो इसे ।" उस व्यक्ति ने पेटी उठा ली और उस युवक के पीछे पीछे चुपचाप चल दिया । घर पहुंच कर युवक पेटी रखवाकर उस व्यक्ति को मजदूरी देने लगा तो उस व्यक्ति ने कहा, "धन्यवाद, इस की आवश्यकता नहीं है?"" क्यों ?"  युवक ने आश्चर्य से पूछा, किंतु उसी समय युवक के बड़े भाई घर से निकले और उन्होंने उस व्यक्ति को देख कर प्रणाम किया । अब युवक को पता लगा कि वह जिस व्यक्ति से पेटी उठवा कर लाया है वह तो बंगाल के प्रतिष्ठित विद्वान ईश्वर चंद्र विद्यासागर हैं । युवक उन के पैरों पर गिर पड़ा । विद्यासागर बोले, "मेरे देशवासी व्यर्थ अभिमान छोड़ दें और समझ लें कि अपने हाथों से अपना काम करना गौरव की बात है । वे स्वावलंबी बनें, यही मेरी मजदूरी है और तभी मेरा भारत श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है।"

सोमवार, 25 जून 2012

उपयोगी

एक दिन प्रसिद्ध ब्रिटिश विचारक जान रस्किन अपने मित्र के साथ लंदन की गलियों से गुजर रहे थे । रास्ता गंदा व कीचड़ भरा था । रस्किन का मित्र बारबार नाक-भौंह सिकोड़ता व कहता कि इस गंदगी में चलने में कितना कष्ट हो रहा है ? इस पर रस्किन हंस कर बोले, ''मित्र, यदि तुम विचार करो तो पाओगे कि हम हीरा, पन्ना और जवाहरातों पर चल रहे हैं ।''
                                                उनका मित्र यह सुनकर चकित हुआ और उनकी तरफ देखने लगा । रस्किन ने आगे कहा, ''तुम्हीं बताओं कि यह काली मिट्टी क्या हैं ? क्या यह उसी खान में से नहीं निकलती है जिस में से हीरा निकलता है । इसलिए मैं कहता हूं कि इस संसार में गंदी या नाचीज कहलाने लायक कोई वस्तु नहीं है । जिसे हम लोग नाचीज समझते हैं, वह बहुधा सब से बढ़ कर उपयोगी निकल जाती है, केवल उसे अपनाने और उसे लेकर आगे बढ़ने का हौसला होना चाहिए।''

मंगलवार, 13 मार्च 2012

मित्र

अमरीका में गृह युद्ध चल रहा था । उस समय अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति थे । एक बार वह घायलों के खेमें में गए । वहां से घूमते-घूमते वह दुश्मन सैनिकों के खेमें में भी चले गए और उन से प्यार से बातें करने लगे। जब वह बाहर निकले तो एक बुढि़या ने उनसे पूछा, ''तुम अपने दुश्मनों से इतने प्यार से क्यों बोलते हो, जब कि तुम्हें तो उन्हें खत्म कर देना चाहिए।'' अब्राहम लिंकन ने मुस्करा कर उत्तर दिया, ''क्या मैं अपने दुश्मनों का खत्म नहीं कर देता, जब मैं उनसे दोस्ती कर के उन्हें अपना मित्र बना लेता हूं।''

बुधवार, 30 नवंबर 2011

प्रगति में बाधक

एक बार संत विनोबा भावे को गांधी जी ने पत्र लिखा । पत्र पढ़कर विनोबा जी ने उसे फाड़ दिया । यह देखकर आश्रम के छात्रों को बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि सभी जानते थे कि विनोबा सदा ही गांधी जी के पत्र संभाल कर रखते थे। एक छात्र से न रहा गया उसने विनोबा जी से पूछ ही लिया,''आप ने पत्र क्यों फाड़ दिया?'' विनोबा जी ने बताया,''इस पत्र में कुछ गलत बातें लिखी थीं ।'' यह सुनकर छात्रों का कुतूहल बढ़ गया । एक ने पूछा,लेकिन गुरुदेव, ''आप तो कहते हैं कि गांधी जी कभी झूठ नहीं बोलते फिर उन्होंने झूठी या गलत बात कैसे लिखी?''''गांधी जी झूठ नहीं बोलते यह सच है, लेकिन इस पत्र में उन्होंने मेरी प्रशंसा की थी और मुझे सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति कहा था । सच तो यह है कि इस संसार में मुझ से भी अधिक गुणी व्यक्ति मौजूद हैं । अतः गांधी जी की यह बात सच नहीं हो सकती थी, शायद किसी दृष्टि से यह सच भी हो तो भी यह पत्र मुझ में अंहकार ही पैदा करता, जो मेरी प्रगति में बांधक होता। बस, इसलिए मैंने पत्र को फाड़ डाला।''

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

व्यक्तिगत धारणा

नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने एक विरोधी को उच्च पद पर नियुक्त किया तो कुछ अधिकारियों ने कहा, ''सम्राट, इस व्यक्ति के विचार आप के बारे में अच्छे नहीं हैं ।'' नेपोलियन ने हंसते हुए कहा, ''जिस पद के लिए मैंने उस व्यक्ति को नियुक्त किया है, उसके लिए वह पूर्णतया योग्य है ।'' मेरे बारे में उसकी व्यक्तिगत धारणा क्या है, इसकी मुझे परवाह नहीं, क्योंकि कोई किसी का कुछ भी बिगाड़ अथवा संवार नहीं सकता।''

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

कर्म का महत्तव

एक बार एक गरीब किसान ने गौतम बुद्ध से अपने गांव आने का आग्रह किया। बुद्ध उस गांव में पहुंचे तो सारे गांव के लोग उन्हें देखने के लिए उमड़ पड़े, लेकिन उसी दिन बुद्ध को गांव बुलाने वाले किसान के बैलों की जोड़ी कहीं खो गई । किसान अब दुविध में फंस गया कि वह महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुनने जाए या अपने बैलों को खोजे । काफी सोचने के बाद उसने अपने बैलों को ही ढूंढ़ने का निर्णय किया ।
घंटों भटकने के बाद कहीं जा कर उसे अपने बैल मिले । थकामांदा किसान घर आते ही भोजन कर के सो गया । अगले दिन वह संकोच के साथ बुद्ध के पास गया । बुद्ध उसकी परेशानी समझ गए और बोले, ''मेरी नजर में यह किसान ही मेरा सच्चा अनुयायी है । इसने उपदेशों से अधिक कर्म को महत्त्व दिया है । अगर कल यह अपने बैल खोजने न जाता और यहां आ कर मेरा प्रवचन सुनने लगता तो इसे मेरी कही हुई बातें समझ में नहीं आतीं, क्योंकि इस का मन कहीं और भटक रहा होता । इसने कर्म को महत्त्व दे कर सराहनीय कार्य किया है।''

सोमवार, 31 जनवरी 2011

विनम्रता

एक बार अमरीका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन अपने दोस्त के साथ घोड़ा गाड़ी से कहीं जा रहे थे । रास्ते में एक मजदूर ने उन्हें थोड़ा झुक कर प्रणाम किया। उसके उत्तर में अब्राहम लिंकन ने उससे भी और ज्यादा झुक कर प्रणाम किया। यह देखकर उनके मित्र ने उनसे पूछा, ''आप ने उस छोटे से मजदूर को इतना झुक कर प्रणाम क्यों किया ?'' अब्राहम लिंकन ने जवाब दिया, ''मैं नहीं चाहता कि विनम्रता में कोई मुझ से आगे निकल जाए ।'' यह सुन कर उनके मित्र का सिर श्रद्धा से झुक गया ।

बुधवार, 5 जनवरी 2011

सच्ची शिक्षा

उन दिनों अमरीका में दास प्रथा का चलन था । एक धनी व्यक्ति ने बेंकर नाम के मेहनती गुलाम को खरीदा । वह बेंकर के गुणों से संतुष्ट था । एक दिन बेंकर अपने मालिक के साथ उस जगह गया, जहां लोग जानवरों की तरह बिकते थे तभी बेंकर ने एक बूढ़े दास को खरीदने के लिए कहा । उस के आग्रह करने पर मालिक ने उसे खरीद लिया और घर ले गया ।
बेंकर प्रसन्न था । वह उस बूढ़े दास की खूब सेवाटहल करता था । मालिक द्वारा एक दिन इस विषय में पूछने पर बेंकर ने बताया कि यह दास उसका कोई संबंध नहीं है, न ही मित्र है, बल्कि उसका सब से बड़ा दुश्मन है। बचपन में इसी ने मुझे दास के रूप में बेच दिया था । बाद में खुद पकड़ा गया और दास बना लिया गया । मैंने उस दिन बाजार में इसे पहचान लिया था । मेरी मां ने मुझे बताया था कि अगर दुश्मन नंगा हो तो उस को कपड़े दो, भूखा हो तो खाना खिलाओ, प्यासा हो तो पानी पिलाओ, इसी कारण मैं इसकी सेवा करता हूं और अपनी मां को दी हुई शिक्षा पर चलता हूं । यह सुन कर मालिक ने बेंकर को गले लगा लिया और उसको आजाद कर दिया ।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

सहिष्णुता

दीवाली  की  हार्दिक  शुभकामनाएं 
उन दिनों दिवंगत लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे । एक बार वह रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे । प्रथम श्रेणी के डिब्बे में अपनी सीट पर एक बीमार व्यक्ति को लिटा कर, वह स्वयं तृतीय श्रेणी में जाकर उसकी बर्थ पर चादर ओढ़ कर लेट गए।थोड़ी देर में सो गए । कुछ समय बाद टिकट निरीक्षक आया और उन्हें सोता पाकर बुरा भला कहने लगा ।
लालबहादुर शास्त्री उसकी आवाज सुन कर जागे । जब उन्होंने टिकट निरीक्षक को अपना परिचयपत्र दिखाया तो टिकट निरीक्षक बुरी तरह घबरा गया। बोला, ''सर, आप और तीसरे दरजे में? आप चलिए, मैं आपको आपके डिब्बे में पहुंचा दूं।'' लेकिन वह मुस्कराते हुए बोले,''अरे भैया, मुझे तो नींद आ रही है।क्यों मेरी मीठी नींद खराब करते हो।'' वह फिर से चादर ओढ़ कर सो गए ।