शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

सहिष्णुता

दीवाली  की  हार्दिक  शुभकामनाएं 
उन दिनों दिवंगत लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे । एक बार वह रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे । प्रथम श्रेणी के डिब्बे में अपनी सीट पर एक बीमार व्यक्ति को लिटा कर, वह स्वयं तृतीय श्रेणी में जाकर उसकी बर्थ पर चादर ओढ़ कर लेट गए।थोड़ी देर में सो गए । कुछ समय बाद टिकट निरीक्षक आया और उन्हें सोता पाकर बुरा भला कहने लगा ।
लालबहादुर शास्त्री उसकी आवाज सुन कर जागे । जब उन्होंने टिकट निरीक्षक को अपना परिचयपत्र दिखाया तो टिकट निरीक्षक बुरी तरह घबरा गया। बोला, ''सर, आप और तीसरे दरजे में? आप चलिए, मैं आपको आपके डिब्बे में पहुंचा दूं।'' लेकिन वह मुस्कराते हुए बोले,''अरे भैया, मुझे तो नींद आ रही है।क्यों मेरी मीठी नींद खराब करते हो।'' वह फिर से चादर ओढ़ कर सो गए ।

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

इंसानियत

विवेकानंद किशोरावस्था में व्यायाम के प्रति काफी रूचि रखते थे । वह प्रतिदिन व्यायामशाला जाया करते थे । एक बार वह व्यायामशाला में झूला लगा रहे थे, कि अचानक एक अंग्रेज नाविक ने उनसे और उनके दोस्तों से किसी बात पर झगड़ा शुरू कर दिया । अभी झगड़ा चल ही रहा था कि अचानक व्यायामशाला का एक खंभा अंग्रेज के सिर पर गिर पड़ा, जिससे उसका सिर फट गया और खून बहने लगा ।
खून देख कर अन्य किशोर तो डर गए पर विवेकानंद ने झट झगड़ा भुला दिया और मानसिक संतुलन खोए बिना अपनी कमीज फाड़ी, नाविक के घायल सिर पर पट्टी बांध दी और उसकी बगल में बैठ कर पंखा करने लगे । कुछ देर बाद अंग्रेज नाविक होश में आ गया, बाद में वह अंग्रेज विवेकानन्द का घनिष्ठ मित्र बन गया ।

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

आत्मविश्वास

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद उस समय 11वीं कक्षा में पढ़ते थे । वह बहुत तीक्ष्ण बुद्धि के थे । उस समय देश पर अंग्रेजों का शासन था । राजेन्द्र प्रसाद जिस स्कूल में पढ़ रहे थे, वहां एक अंग्रेज शिक्षक था । जिसके जिम्मे 11वीं कक्षा के प्रश्न पत्र जांचने का काम था ।
जब परीक्षाफल घोषित हुआ तो इस शिक्षक ने प्रथम स्थान पर किसी अंग्रेज छात्रा का नाम घोषित किया । परीक्षाफल के अनुसार राजेन्द्र प्रसाद का बहुत मामूली स्थान था । अपना परीक्षापफल देखने के बाद राजेन्द्र प्रसाद शिक्षक के पास जा कर बोले, ''सर, मेरा नाम प्रथम स्थान पर नहीं आया है । मेरा विश्वास है कि मुझे गलत स्थान दिया गया है ।'' प्रधानाध्यापक ने जाने क्या सोच कर उस आत्मविश्वासी किशोर के हल किए परचों की जांच की और पाया कि उस बालक ने वास्तव में प्रथम स्थान प्राप्त किया था ।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

सार्थक

हिन्दी दिवस के अवसर पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रसिद्ध हिंदी कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ शांतिनिकेतन में अपना अध्ययन समाप्त कर जब वापस लौटने लगे तो उन्होंने संस्था के मुख्य आचार्य क्षितिमोहन सेन से आशीर्वाद मांगने के लिए उनके पांव छुए । आचार्य ने पीठ पर हाथ रखकर कहा ,'' तुम कभी सफल न बनना ।'' ‘सुमन’ इस बात से भौंचक्के रह गए । उन्होंने सोचा, ''शायद मुझ से कोई गलती हो गई, जिससे गुरुजी क्रुद्ध हो गए ।'' साहस करके उन्होंने पूछा, ''गुरुजी, मुझ से क्या अपराध हुआ है ?'' आचार्य बोले, ''देखो, हर वर्ष लाखों लोग सफल होते हैं, लेकिन उनमें काई एकाध् ही सार्थक हो पाता है ।'' इसलिए मेरी इच्छा है कि तुम सार्थक बनो ।''

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

निर्देश

अमरीका के प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन के घर में एक बार चोरी हो गई । उसके बाद उन्होंने अपने घर के बाहर एक बोर्ड लगा दिया जिस पर लिखा - ''इस घर में अब एक ही वस्तु चुराने लायक रही है, वह है चांदी की तश्तरी जो रसोईघर में रखी अलमारी के सब से उपरी खाने में रखी है । पास ही में एक डलिया में बिल्ली के बच्चे हैं । यदि कोई सज्जन डलिया भी ले जाना चाहे तो बिल्ली के बच्चों को किसी कपड़े से ढक जाए । लेकिन किसी प्रकार का शोर न मचाए, अन्यथा घर के लोगों को असुविधा होगी । बाद में उसे भी हो सकती है ।'' यह बोर्ड टंगने के बाद पिफर कभी उनके यहां चोरी नहीं हुई ।